रै गया बिगड़ जमाना ल्याज शर्म सब तारी R gya bigad jamana lyaj sharam sab tari

प्रिय दोस्त, कवि ने समाज के बारे में कहा है कि अब जमाना पहले जैसा नहीं रहा है, आजकल भाई-बहन और माता-पिता से भी लोग बैर करने लगे है, सिर्फ जवान उम्र के लड़के ही नहीं बुढ्ढे भी बदल गए है, इनके अलावा भी बहुत कुछ बदलाव हुए है, आइये इस रागनी से जाने...

रै गया बिगड़ जमाना ल्याज शर्म सब तारी।

मात पिता और भाई बन्ध सब की गैल्या बैर हो गया
बैठना तै दूर रहा बोलणा भी जहर होग्या
अपणा सारा मित्र प्यारा धोखेबाज गैर होग्या
आज काल के छोरों देखे मां बाप पै मारै डाट
सुधी दे कै गाली बोलैं सुणले नै बुढ़े खुर्राट
ईब तेरा आड़ै नहीं ठिकाणा घर तै बाहर बिछा ले खाट
लाठी ले कै न्यूं भी कहै देचीज बाट दे म्हारी।

छोरां को भी दोष नहीं बुढ़ां का भी बिगड़ा ढंग
आछा आछा खावै भाई घर कुणबे ने राखै तंग
साठ साल के होकै ने ब्याह करवाणा चाहवै मलंग
धोले लते हाथ में डोगा बैठे-2 हुकम चलावै
सुलफा, और गांझा पीवैं ताशां की भी बाजी लावै
गालो की म्हां घुमें जा से बहु बेटी पै ध्यान डिगावै
मुछां पर कै हाथ फेर कै कुण सुणैगा म्हारी

ये बीर भी सतवन्ती कोन्या इन का भी मैं करूं ब्यान
गैर मर्द की गैल्या होले अपणे का ना राखै ध्यान
यारां सेती बात कर करके प्यारे के ले लै से प्रान
बहुत सी रुपये पैसे के लोभ में मनै ललचाती देखी
घर कुणबे की ईज्जत खौवै अपणी नै डुबाती देखी
रूपवान गुणवान छोड़ कै कंगले के संग जाती देखी
हर दम संकट जी नै रासा राखैं सै कलिहारी।

दुनियां में बेमारी फैली मोड्यां के भी बणगे पंथ
साधु और स्वादुओ के जगा जगा पै बैठे पंथ
गाम में भी घूणां उपर हमने देखे बैठे सन्त
बहुओं के काढ़े से ये बहुत से कनपाड़े फिरै
घर कुणबे तै लड़ कै भाई घी दुधों के लाड़े फिरै
म्हारे भारत में भोडे नागे 60 लाख उघाड़े फिरै
साधु थोड़े घणे रै स्वादु कोण कहै तपधारी।

भजनी सांगी गाम कै म्हां आकै नै बजावै ढोल
कच्ची मन्दी बाणी बोलै लुगांड़ा के फिरै टोल
सुण सुण कै ने राग रागनी माणस होज्या डावा डोल
कोए कहै बात ठेस की कोए कहै सौ का जोड़
रुपयो की बरसात करदे ना सुल्फे का कोए ओड़
कोए कहै बात काट दी लखमी चन्द नै कर दिया तोड़
कह मेहर सिंह समझणीयां ने सब तरियां लाचारी।

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