इतने अरमान थे कि हर अरमान में दम निकले Irne arman the ki har arman me dam nikle

बहुत अरमान थे मेरे, फिर भी कम निकले,
इतने अरमान थे कि, हर अरमान में दम निकले...

हिंदी शायरी की इन चंद लाइनों में किसी शायर ने अपने दिल की हसरतों को बड़ी खूबसूरती से बयान कर दिया.

 

जिंदगी से या उपर वाले से शिकायतें तो हर किसी को रहती हैं कि उसने मेरे साथ बड़ी ना इंसाफी की है. कभी - कभी गुस्सा आता है अपनी जिंदगी पर, मगर हम उस ऊपर वाले की नियामतों पर गौर भी तो करें. ये शिकायतें तो सबको रहतीं हैं कि हमें ये नहीं मिल रहा, हमें वो नहीं मिल रहा, मगर इस बात का शुक्रिया भी तो मनाएं की हमें क्या-क्या मिल रहा है. शिकायतें ही शिकायतें क्यों? 

कभी ऊपर वाले का शुक्रिया भी तो मनाएं. गुस्सा और क्रोध में तो इंसान घुटता है और अगर ये लम्बे समय तक कायम रहे तो शरीर के साथ मन को भी नुकसान पहुंचाता है. क्रोध में इंसान सबसे ज्यादा अपने आपको नुकसान पहुचाता है. ज़िंदगी तो उपर वाले का वरदान है. अब किसी को ख़ुशी ज्यादा मिलीं तो किसी को गम ज्यादा. उस ऊपरवाले का भी तो हम शुक्रिया अदा करें कि उसने हमें इंसान बनाया. खुशियाँ और गम तो सभी को मिलते रहते हैं, लेकिन बहुत ज्यादा शिकायत करके शायद हम खुद का ही अहित करते हैं.

याद आ रहे हैं एक हिंदी फिल्म के कुछ दिल को छू लेने वाले संवाद “ये जीना भी तो जीना है, अगर ये जीना, जीना नहीं है, तो फिर जीना क्या है?”

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