पूजा करें, सौदा नही Puja karen sauda nahi

पूजा करें, सौदा नही Puja karen sauda nahi, Only Worship, no deal.

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ।।

इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल की इच्छा वाले, देवताओं को पूजते हैं क्योंकि उनको कर्मों की सिद्धि जल्दी मिल जाती है।

यदि कर्मों का फल जल्दी चाहते हैं तो देवताओं का पूजन करें, क्योंकि जब हम कोई कर्म करके फल की चिंता करते हुए कर्म करते हैं तो उसके करने से पहले ही उसका फल सोच लेते हैं। करने के बाद जल्दी ही भगवान से फल की इच्छा भी रखने लगते हैं। जब मंदिर जाते हैं तो देवताओं से अपनी मुराद मांगने के लिए अपने साथ मन में एक लिस्ट भी ले जाते हैं। पांच रुपये का प्रसाद चढ़ाकर, पांच हजार रुपये के काम हो जाने का वरदान मांगते हैं। यदि उस देवता से मुराद पूरी हो गई तो ठीक, नहीं तो मंदिर या देवता बदल लेते हैं।

इस तरह से जिस देवता के सामने इच्छा पूरी होती रहे, उसको अपना इष्ट मान लेते हैं। यह पूजा नहीं सौदा है। देखा जाए तो हम प्रभु को पाने के लिए प्रार्थना नहीं करते, बल्कि अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए उनको पूजते हैं। वैसे तो इसमें कुछ गलत नहीं है। अगर हम देवता से नहीं मांगेंगे तो किससे मांगेंगे? हम यह भूल जाते हैं कि भगवान को बिना मांगे भी पता है कि मेरे भक्त को क्या चाहिए? ध्यान रहे, आसक्त होकर देवता को पूजने से कर्मों के फल तो मिल जाएंगे, लेकिन उस देवता का देवत्व कभी नहीं मिलेगा।

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