विपत्तियों से डरिए नहीं लड़िये Vipattiyo se dariye nahi ladiye

विपत्तियों से डरिए नहीं लड़िये Vipattiyo se dariye nahi ladiye, Do not be afraid to fight plagues

मनुष्य की इच्छा हो या न हो, जीवन में परिवर्तनशील परिस्तिथियाँ आती रहती हैं। आज उतार हैं तो कल चढाव। चढ़े हुवे गिरते हैं और गिरे हुवे उठते हैं।


आज उँगुली के इशारे पर चलने वाले अनेक अनुयायी हैं, तो कल सुख - दुःख कि पूछने वाला एक भी नहीं रहता। रंक कहाने वाला एक दिन धनपति बन जाता हैं। जीवन में तरह कि परिवर्तनशील परिस्थतियां आते जाते रहना नियति चक्र का सहज स्वाभाविक नियम हैं। अधिकांश व्यक्ति सुख सुविधा, सम्पन्नता, लाभ, उन्नति आदि में प्रसन्न और सुखी रहते हैं, किन्तु दुःख कठिनाई, हानि आदि में उद्विग्न हो जाते हैं। यह मनुष्य के एकांगी दृश्टि कोण का परिणाम हैं और इसी के कारण कठिनाई, मुसीबत, कष्ट आदि शब्दो कि रचना हुई। वस्तुतः परिवर्तन मानव जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण, सहज और स्वाभाविक हैं, जितना रात और दिन का होना ऋतुओ का बदलना, आकाश में ग्रह - नक्षत्रो का विभिन्न स्थितियों में गतिशील रहना, किन्तु केवल सुख लाभ, अनुकूल परिस्थितियो कि चाह के एकांगी दृष्टिकोण के फलस्वरूप मनुष्य दुःख, कठिनाई और विपन्नताओं में रोता हैं, दुसरो को अथवा ईश्वर को अपनी विपरीतताओं के लिए कोसता हैं, शिकायत करता हैं किन्तु इससे तो उसकी समश्याये तो बढती ही जाती हैं, घटती नहीं।

कठिनाइयाँ जीवन कि एक सहज स्वाभाविक स्थिति हैं, जिन्हे स्वीकार करके मनुष्य अपने लिए उपयोगी बना सकता हैं। जिन कठिनाइयों में कई व्यक्ति रोते हैं, मानसिक क्लेश अनुभव करते हैं, उन्ही कठिनाइयों में दूसरे व्यक्ति नवीन प्रेरणा, नव उत्साह पाकर सफलता का वरण करते हैं। सबल मन वाला व्यक्ति बड़ी कठिनाइयों को भी स्वीकार कर आगे बढ़ता हैं तो निर्मल मन वाला सामान्य सी कठिनाई मैं भी निष्चेष्ट हो जाता हैं।

परीक्षा कि कसौटी पर प्रतिष्ठित हुवे बिना कोई भी वस्तु उत्कृष्टता प्राप्त नहीं कर सकती, न उसका कोई मूल्य ही  होता हैं । सोना भीषण गर्मी में तप कर ही सुध और उपयोगी होता हैं। कड़ी धुप में तपने पर ही खेतो में कड़ी फसल पकती हैं आग कि भयानक गोद में पिंघल कर ही लोहा सांचे में ढलने के उपयुक्त बनता हैं। जन-जन द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति पर पैनी छैनी कि असंख्य चोटे पड़ती हैं। परीक्षा कि अग्नि में तपकर ही वस्तु शक्तिशाली, सौंदर्ययुक्त और उपयोगी बनती हैं। मनुष्य भी कठिनाईयों  में तपकर ही उत्कृष्ट और मत्वपूर्ण बनता हैं।

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